भारत देश जो अपनी अनेकता में एकता का प्रतीक बन संपूर्ण दुनिया में अपनी वैभवता के लिए जाना जाता है। वही भारत का इतिहास हमारे देश के अखंडता में चार चांद लगा देता है । भारत की सरजमी में मिश्रित हमारे शहीदों का पावन रक्त हमारी धरा को और भी अतुलनीय बना देता है ,जहां पग -पग पर क्रांतिकारियों के किस्से हमें जोश से भर देते हैं। एक ऐसे ही बालक का जन्म 18 नवंबर वर्ष 1990 को बंगाल के ग्राम-ओँयाड़ि में होता है । तब किसे पता था कि बंगाली कायस्थ परिवार में जन्मा बटुकेश्वर दत्त आगे चलकर भारत का महान क्रांतिकारी बन जाएगा । बटुकेश्वर दत्त का बचपन पराधीन भारत में बीतता गया परंतु अंग्रेजों की गुलामी उन्हें हमेशा खटकती रही ।
बटुकेश्वर दत्त की मन में प्रज्वलित क्रांति की लौ क्रांति की मशाल तब बनी जब उनकी मुलाकात 1924 में भगत सिंह से हुई।यू तो बटुकेश्वर दत्त कानपुर स्नातक की डिग्री लेने गए थे। परंतु भारत मां के इस वीर को गुलाम भारत में सांस लेना मंजूर नहीं था।वे जल्द ही हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन से जुड़ गए तथा चंद्रशेखर आजाद, सुखदेव और राजगुरु के साथ भी उन्होंने काम किया।इन महान क्रांतिकारियों का एक साथ आना यकीनन हमारी आजादी की उमंग को एक नई दिशा देने के समान था।HSRA से जुड़कर बटुकेश्वर दत्त ने भी बम बनाना सीख लिया।और उस बम का प्रयोग उन्होंने बहरे पड़े अंग्रेजों के कानों में क्रांति का आगाज करने के लिए किया।
और इस तरह जब 8 अप्रैल 1929 को पब्लिक सेफ्टी बिल दिल्ली स्थित केंद्रीय विधानसभा में पेश किया जाना था। उस समय बटुकेश्वर दत्त तथा भगत सिंह बचते- बचाते असेंबली के अंदर प्रवेश करने में सफल हो गए। जैसे असेंबली में बिल पेश हुआ तब विजिटर गैलरी में उपस्थित बटुकेश्वर दत्त और भगतसिंह उठे और खाली बेंच में दो बम फेंक दिए ।और इंकलाब जिंदाबाद तथा साम्राज्यवाद मुर्दाबाद के नारे लगाने लगे। इस बम धमाके से किसी की जान नहीं गई क्योंकि बम ज्यादा शक्तिशाली नहीं थे l बटुकेश्वर दत्त और भगत सिंह का उद्देश्य केवल विरोध प्रदर्शन करना था।क्योंकि पब्लिक सेफ्टी बिल का उद्देश्य स्वतंत्रता प्रेमियों पर नकेल कसना तथा उनकी गिरफ्तारी के लिए अंग्रेजों को ज्यादा अधिकार देना था।बम धमाके की गूंज को अंग्रेजी सत्ता ने स्वयं पर प्रहार समझा तथा भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त को गिरफ्तार कर लिया।बटुकेश्वर दत्त और भगतसिंह चाहते तो धमाके के बीच उत्पन्न हुए धुएं को ढाल बनाकर भाग सकते थे, परंतु आजादी के परवानों को अंग्रेजों से डरकर भागना मुनासिब नहीं लगा ।
बटुकेश्वर दत्त को अंग्रेजी हुकूमत द्वारा उम्र कैद की सजा सुना दी गई तथा काला पानी की सजा हेतु अंडमान निकोबार की जेल मे प्रताडऩा हेतु भेज दिया गया ।काला पानी की सजा के दौरान जब उन्हें पता चला कि उनके साथी भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दे दी गई है तो वे अत्यंत दुखी हुए।आजादी की जंग में वे अपने साथियों से सदा के लिए बिछड़ चुके थे।साथियों की शहादत की खबर उनके लिए जितनी पीडादायक थी ,उतना ही अपने साथी भगत सिंह द्वारा लिखित पत्रों की बातें जब उन्हें याद आती तो प्रेरणा स्रोत बन जाती। भगत सिंह ने उन पत्रों में लिखा था कि क्रांतिकारी अपने आदर्शों के लिए मर ही नहीं सकते ,बल्कि जीवित सहकर जेलों की कोठियों में हर तरह का अत्याचार भी सहन कर सकते हैं।अंडमान निकोबार की जेल में क्रांतिकारियों पर किए जाने वाली तमाम दिल दहला देने वाली यातनाओं के बावजूद भारत की आजादी का स्वप्न अपने मन में बसाए बटुकेश्वर दत्त सब यातनाएं सहते गए। इसी दौरान उन्हें टीबी भी हो गया तथा वे मरते-मरते बचे ।वर्ष 1937 में उन्हें बांकीपुर केंद्रीय कारागार पटना लाया गया तथा 1938 में उनकी रिहाई हो गई।कालापानी की सजा ने भले ही उनको शारीरिक रूप से कमजोर किया, परंतु उनका हौसला नहीं तोड़ पाए। बटुकेश्वर दत्त जल्द ही 1942 में गांधीजी के भारत छोडों आंदोलन से जुड़ गए तथा उन्हें फिर से गिरफ्तार कर लिया ।15 अगस्त 1947 को भारत में आजादी का सूर्योदय हुआ, जिसने अनेक आजादी के परवानों की तपस्या को सफल बनाया। देश की आजादी के साथ बटुकेश्वर दत्त भी रिहा कर दिए गए। बटुकेश्वर दत्त का स्वतंत्र भारत की फिजाओं में सांस लेने का स्वप्न पूरा हुआ।
आजादी की जंग के पास बटुकेश्वर दत्त भी सामान्य जीवन जीने की ओर अग्रसर हो गए तथा उन्होंने नवंबर 1947 को अंजली नाम की लड़की से शादी कर ली।परंतु बटुकेश्वर दत्त के जीवन में परेशानियां कम होने का नाम नहीं ले रही थी । अब बटुकेश्वर दत्त को आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ा। उन्होंने सिगरेट कंपनी में एजेंट की नौकरी की तथा बाद में बिस्कुट बनाने का छोटा कारखाना भी खोला, पर बाद में नुकसान होने के चलते इसे भी बंद कर दिया ।बटुकेश्वर दत्त ने टूरिस्ट गाइड का काम करके भी अपना जीवन यापन किया । यकीनन बहुत मुश्किल है, यकीन करना कि भारत मां का यह वीर आजादी की जंग लड़ने के बाद भी अपने जीवन से इस तरह जंग लड़ता रहा।परंतु हद तो तब हो गई जब पटना में बसों के लिए परमिट मिल रहे थे ,तो बटुकेश्वर दत्त द्वारा आवेदन करने पर पटना के कमिश्नर द्वारा उनका स्वतंत्रता सेनानी होने का प्रमाण पत्र लाने को कहा गया ।हालांकि बाद में राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को इस बात का मर्म ज्ञात होने के बाद उन्होंने कमिश्नर को बटुकेश्वर दत्त से माफी माँगने को कहा । और बाद में उन्हें 4 महीने के लिए विधान परिषद का सदस्य भी मनोनीत किया गया । वर्ष 1964 को दत्त बीमार पड़ गए तब उन्हें पटना के सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया । अखबारों में जब लेख प्रकाशित हुए तब उन्हें 22 नवंबर 1964 को दिल्ली लाया गया ,जहां उन्हें कैंसर से पीड़ित बताया गया।अपने जीवन के अंतिम क्षणों में बटुकेश्वर दत्त अक्सर अपने साथियों को याद करके रो पड़ते थे।भगत सिंह की मां विद्यावती जब उनसे मिलने आई तब उन्होंने अपने अंतिम इच्छा जताई कि वे अपने साथियों के समाधि के पास अपना अंतिम संस्कार करवाना चाहते हैं।
20 जुलाई 1965 को रात 10:45 में बटुकेश्वर दत्त अपने जीवन की जंग हार गए।और उनकी इच्छा के अनुसार ही भारत पाकिस्तान सीमा के करीब हुसैनीवाला बाग में अपने साथियों के समाधि के पास उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया । भारत देश आप जैसे महान क्रांतिकारी का हमेशा ऋणी रहेगा । अब हमारी स्मृतियों में हमेशा के लिए जीवंत रहेंगे ।
इंकलाब जिंदाबाद!🇮🇳
Writer💕🧿✨
ReplyDeleteTq yara❤️
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