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प्रीतिलता वाद्देदार

 1911 का औपनिवेशिक भारत जब अपनी आजादी के लिए ब्रिटिश सत्ता से जूझ रहा था ,उस समय भारत के पूर्वी हिस्से बंगाल में बंग भंग के खिलाफ आंदोलन अपनी पुरजोर अवस्था में थे । विभाजन के फल स्वरुप उत्पन्न उच्च स्तरीय राजनीतिक अशांति के कारण तथा जनता के दबाव की वजह से बंगाल के पूर्वी एवं पश्चिमी हिस्से पुन: एक होने जा रहे थे। बंगाल में उत्पन्न इस राजनीतिक  उथल-पुथल के बीच तत्कालीन पूर्वी भारत(अब बांग्लादेश) में स्थित चटगांव के एक नगरपालिका क्लर्क के घर खुशियां दस्तक देती है ।  5 मई 1911 को जगबंधु वाद्देदार और प्रतिमा देवी को पुत्री रत्न की प्राप्ति होती है ।जगबंधु  वाद्देदार ने तब बडे लाड़ प्यार से अपनी लाडली का नाम रखा  प्रीतिलता । तब उन्हें कहां पता था  कि उनकी लाडली  एक दिन पहली बंगालन महिला क्रांतिकारी बन जाएगी | 

   



 चटगांव की गलियों, खेतों, खलियानों में नन्ही प्रीतिलता अब धीरे-धीरे बड़ी होने लगी । प्रीतिलता का मेधावी  तथा ओजस्वी होना उनके पिता से छुपा ना था। अतः अपनी आर्थिक स्थिति कमजोर होने के बावजूद उन्होंने प्रीतिलता की शिक्षा दीक्षा में तनिक भी कमी नहीं आने दी । और उसी का परिणाम था कि , प्रीतिलता ने 1927 में अपनी मैट्रिक प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। अपने स्कूली जीवन में प्रीतिलता बालचर संस्था की सदस्य बनी । बालचर संस्था में तब सदस्यों द्वारा ब्रिटिश साम्राज्य के प्रति एकनिष्ट होने की शपथ लेनी पड़ती थी । यह शपथ प्रीतिलता को बहुत बेचैन करती थी । प्रीतिलता के जीवन का यही क्षण था जब उनके अंदर क्रांति के बीज का अंकुरण होता है। रानी लक्ष्मी बाई के जीवन से भी  वह बहुत प्रभावित थी ।


17 साल में मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण कर आगे की पढ़ाई के लिए प्रीतिलता अब ढाका आ गई। ईडन कॉलेज से जब वो इंटरमीडिएट कर रही थी , तब क्रांतिकारी गतिविधियों में वह गहरी दिलचस्पी लेने लगी। उस समय बंगाल ने तब गांधी के अहिंसा के विचारों का परित्याग कर दिया। उनके स्थान पर अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ हथियारबंद लड़ाई को बढ़ावा देने हेतु क्रांतिकारी संगठनों ने अपनी जगह ले ली। इंटर के बाद प्रीतिलता ने दर्शन शास्त्र में स्नातक करने के लिए कोलकाता के बैथ्यून कॉलेज में एडमिशन लिया। उस दौरान मास्टर दा के गुप्त क्रांतिकारी दल के सक्रिय सदस्य रामकृष्ण कोलकाता के अलीपुर जेल में बंद थे। मनोरंजन राय के कहने पर प्रीतिलता ने उनसे लगभग 40 बार जेल के अंदर मुलाकात की और जब रामकृष्ण को फांसी दे दी गई तो इस घटना का प्रीतिलता के जीवन में गहरा प्रभाव पड़ा। उनके शब्दों में "रामकृष्ण की फांसी के बाद क्रांतिकारी गतिविधियों में सीधे शामिल होने की मेरी इच्छा बहुत बढ़ गई है "। लेकिन उस समय उनके पिता की नौकरी चली गई और घर की सारी जिम्मेदारी भी प्रीतिलता के कंधों पर आ गई। तमाम परेशानियों के बाद भी प्रीतिलता ने अपनी पढ़ाई जारी रखी। लेकिन ब्रिटिश अफसरों ने उनकी डिग्री पर रोक लगा दिया। प्रीतिलता इस बात से अत्यंत दुखी हुई।  


अपनी पढ़ाई पूरी कर प्रीतिलता चटगांव वापस आ गई और परिवार को आर्थिक मदद देने हेतु नंदकरण और अपर्णाचरण स्कूल में अध्यापिका बन गई। उन्हीं दिनों में मास्टर द सूर्यसेन और निर्मल सेन से उनकी मुलाकात एक क्रांतिकारी भाई ने कराई। मास्टर दा सूर्यसेन से मिलकर प्रीतिलता का  क्रांतिकारियों के प्रति नजरिया ही बदल गया और क्रांतिकारी संगठन में शामिल होने की उनकी इच्छा प्रबल हो गई । परंतु उन दिनों महिलाओं को क्रांतिकारी समूह में शामिल करना इतना आसान न था। लेकिन मास्टर दा ने प्रीतिलता की प्रतिभा को पररखते हुए उन्हें अपने संगठन में शामिल कर लिया तथा उन्हें हमलों के लिए प्रशिक्षित भी किया। मास्टर दा के इस निर्णय से एक क्रांतिकारी नेता विनोद चौधरी नाराज हुए। परंतु सूर्यसेन को यह बखूबी पता था कि प्रीतिलता की मदद से बिना किसी शक के हथियारों को एक स्थान से दूसरे स्थान लाना ले जाना आसान हो जाएगा।


13 जून 1932 के दिन जब प्रीतिलता सूर्यसेन से मिलने गई उस दौरान अंग्रेजों ने उनके ठिकानों को चारों ओर से घेर लिया । निर्मल सेन तथा अपूर्व सेन भी वहीं मौजूद थे। सूर्यसेन ने लड़ने का आदेश दे दिया। दोनों ओर से लड़ाई प्रारंभ हो गई। अपूर्व सेन तथा निर्मल सेन शहीद हो गए । प्रीतिलता तथा सूर्य सेन अंग्रेजों को चकमा देने में कामयाब हो गए। इस घटना के बाद सूर्यसेन और प्रीतिलता अत्यंत दुखी हुए और उन्होंने बदला लेने का निर्णय लिया। उन्होंने पहाड़ी की तलहटी में यूरोपियन क्लब पर धावा बोलकर अंग्रेजों को मृत्युदंड देने की योजना बनाई। 24 सितंबर 1932 की रात को इस काम को अंजाम देना था। प्रीतिलता के नेतृत्व में कुछ क्रांतिकारी वहां पहुंच गए। पहाड़ताली यूरोपियन क्लब के बाहर नोटिस बोर्ड में लिखे शब्दों को "डॉग एंड इंडियंस आर नॉट अलाउड " अंतिम बार उन्होंने प्रतिशोध की निगाहों से देखा और अपने पास रखे पोटेशियम साइनाइड की पुड़िया को टटोला और वंदे मातरम के आगाज के साथ क्लब पर हमला बोल दिया। उन्होंने बाहर से क्लब की खिड़की में बम लगा दिया। बम फटने और पिस्तौल की गोलियों के कारण देखते ही देखते अंग्रेज जख्मी होने लगे । मदहोशी में डूबे अंग्रेजों को प्रीतिलता ने मौत का मंजर दिखा दिया और एक यूरोपीय महिला भी मारी गई । इस दौरान अंग्रेजों द्वारा की गई जवाबी फायरिंग में एक गोली प्रीतिलता को लगी और वह जमीन में गिर पड़ी। फिरंगियों के हाथ ना लगने का प्रण लेते हुए उन्होंने पोटेशियम साइनाइड खा लिया और अपने वतन पर मात्र 21 साल की उम्र में कुर्बान हो गई। उनकी हुंकार सदा के लिए मौन हो गए, परंतु उनके विचार उनके साथ- साथ अमर हो गए। उनके बलिदान के बाद ब्रिटिश उपनिवेश वादियों को तलाशी के दौरान एक चिट्ठी मिली। उसमें लिखा था "चटगांव शस्त्रागार कांड के बाद जो रास्ता अपनाया जाएगा ,वह भावी विद्रोह का प्राथमिक रूप होगा। यह संघर्ष भारत को पूरी स्वतंत्रता मिलने तक जारी रहेगा ।"


प्रीतिलता की मृत्यु के 80 साल बाद 22 मार्च 2012 को पश्चिम बंगाल के राज्यपाल एमके नारायण की पहल पर प्रीतिलता की डिग्री को कोलकाता विश्वविद्यालय द्वारा रिलीज किया गया ।


धन्य है हमारी धरा, जो प्रीतिलता वद्देदार जैसे क्रांतिकारियों की पावन रक्त से सिंचित है।

वंदे मातरम!

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