दोस्तों उम्मीद करती हूं इस महामारी में भी आप लोग खुद को खुश रखने की पूरी कोशिश कर रहे होंगे। और यदि आप लोगो मेंं से किसी की इच्छा यही सवाल मुझसे पूछने की हो तो मैं यही बोलूंगी कि मुझे खुश रहने कौन देता? क्यों आ जाते हैं ये भारत साहिल नवोदय से वापस घर। इन दोनों को तो नवोदय के सामने झोपड़ी बनाकर रहना चाहिए।और ये साहिल तो जिंदगी में कभी नहीं सुधर सकता। गृहयुद्ध चल रहा है हमारे घर में मेरे और साहिल के बीच। युद्ध के तात्कालिक कारण है कि साहिल को यह लगता है कि मम्मी साहिल और मुझमें भेदभाव करती🤣साहिल से ज्यादा मुझसे प्यार करती हैं । पर यार सच में साहिल की बात में दम तो मुझे भी लगता है।कैसे मम्मी नवोदय से साहिल के आने पर मुझे भूल ही जाती हैं।इसका मतलब वायरल खबर सच निकली, मम्मी भेदभाव करती हैं।मम्मी गलत बात🤣
चलो काम की बात पर आ जाते हैं।आज छत पर टहलते हुए एक मां और उसके बच्चों की कहानी सामने आ गई और उस मां का नाम था लूसी। आप लोग ज्यादा सोचो मत लूसी भी हो सकता है किसी मां का नाम।
जब मेरा पूरा परिवार खामटीपुर से अंजनिया आया था बसने।पापा बताते हैं एक कुत्तिया थी जो रोज रात को हमारे घर के सामने सोती थी। पड़ोस में सभी उसे लूसी कहकर पुकारते थे।सीधे और सरल स्वभाव की लूसी एक दिन अचानक रात को 2:00 बजे बहुत जोर जोर से भौकने लगी। पहले तो उस पर पापा ने ध्यान नहीं दिया, लेकिन लगातार उसके भोंकते रहने से पापा ने उठकर घर का गेट खोला।तो पापा ने जो देखा वह किसी कहानी से परे यथार्थ जीवन का दृश्य था । लूसी अपनी जान की परवाह किए बिना हमारे घर में घुसने से एक सांप को रोक रही थी। कहानियों में सुने जानवरों की वफादारी के किस्से आज सच होते पापा ने देखा । पापा ने बिना देर किए डंडा उठाया और उस जहरीले सांप को घर के पास ही स्थित एक तालाब तक छोड़ दिया।इस तरह घर के लोगों का लगाव लूसी से बढ़ने लगा। इस सब के बाद भी हम लोगों ने उसे अपने घर के बाहर ही रहने दिया।16 सदस्यों की फैमिली में एक और सदस्य की एंट्री होना बहुत मुश्किल था। Sorry dear Lucie!
और एक दिन लूसी ने बड़ी मम्मी की दिल की धड़कनें बढ़ा दी।
बड़ी मम्मी के चिल्लाने की आवाज से पूरा परिवार घर के बाहर आ गया।बड़ी मम्मी का 2 साल का बेटा भारत उर्फ़ भटा ऊर्फ आलू लूसी के साथ चिपककर मस्त मज़े में घर के बाहर सो रहा था। कहने को तो बड़ा मनोरम दृश्य था, लेकिन उस मां से पूछिए जिसका 2 साल का बेटा उसकी खुद की गोद में ना सो कर किसी जानवर की गोद में सो रहा था ।डर तो बेशक सारे घर वाले गए थे। लेकिन उस डर मे भी सबको यही विश्वास था कि लूसी कुछ नहीं करेगी और वैसा ही हुआ।आलू अपनी नींद पूरी कर के चलता बना। अब समझ में आता है कि आलू की हरकतें ऐसी क्यों है बहुत सोया ना लूसी के साथ बचपन में🤣कु**😂
कुछ दिनों बाद खुशखबरी आने वाली थी। लूसी हमारे घर से सीख लेते हुए खुद की फैमिली को बढ़ाने वाली थी।कुछ समय बाद चौकसे अंकल की खाली पड़ी हुई जमीन पर लूसी ने अपने बच्चों को जन्म दिया। लूसी बहुत खुश थी ।मेरे घर के बहुत पास थी वह जमीन।
मैं और अनुप्रिया दीदी एक दिन लूसी के बच्चे से मिलने गए।
वहां देखा कि चोकसे अंकल के टूटे-फूटे बिना छत के एक बहुत छोटे से कमरे में लूसी के प्यारे-प्यारे बच्चे खेल रहे थे।बिना गेट का वह एक बहुत ही छोटा सा रूम था। लूसी के प्यारे प्यारे बच्चों को दीदी ने गोद पर बहुत खिलाया। और मैं बचपन से ही डरपोक दीपा नामदेव उस दिन भी लूसी के बच्चों को बिना छुए दूर से ही देख कर आनंद लेती गई।और बचपन से ही उधमी मेरी दीदी लूसी के बच्चे को उस दिन भी बहुत परेशान की और इतने में भी जब उसका पेट नहीं भरा तो मेरे बहुत मना करने के बाद भी एक सुंदर से बच्चे को उठाकर घर ले आई।घर लाकर मम्मी से जिद करने लगी कि इस बच्चे को अपने घर में ही रखेंगे।बहुत कोशिश की मम्मी को मनाने की बहुत कुछ बोला कि मम्मी ठंड है, रख लेते हैं। मम्मी वहां गेट नहीं है। बच्चे भाग जाएंगे अपन रख लेते है अपने पास ही । पर मम्मी कहां मानने वाली थी लेकिन मैं तो खुश थी कि यदि वो बच्चा घर मे दिनफर घूमता तो मेरा घर से बाहर जाना तो एकदम तय था। और फिर शाम को जाकर ही लूसी के बच्चे को हमने उसकी मां के पास छोड़ दिया और मम्मी की दी हुई लकड़ी को भी गेट पर अच्छे से लगा दिया ताकि लूसी के बच्चे बाहर ना निकले।हम सारे बच्चे स्कूल से आने के बाद सबसे पहले लूसी के बच्चों से मिलते।और आजू बाजू के लोग भी लूसी के बच्चे को अक्सर खिलाया करते थे।
एक दिन अचानक मैंने सुबह सुबह देखा कि घर के सामने वाली मेन रोड पर कुछ कुत्ते के बच्चे खून से लथपथ मृत पड़े थे।उन बच्चों की सड़क दुर्घटना में मौत हो चुकी थी।और फिर हम तुरंत लूसी के पास चले गए।वहां जाकर देखा तो वहां ना तो लूसी थी ना ही उसके बच्चे! लूसी के कमरे की गेट की लकड़ी रात मे किसी ने निकाल दी।और शायद उसी वजह से लूसी के बच्चे रात मे वहां से निकल कर मेन रोड की तरफ चले गए जहां उनकी सड़क दुर्घटना में मौत हो गई। कुछ देर बाद में लूसी को वापस आते देखा।लूसी की आंखो में मैंने आंसू देखा ।लूसी को देख कर मुझे ऐसा लगा कि शायद वह हमसे कुछ पूछना चाहती हैं
कहां है मेरे बच्चे? उनका कसूर क्या था? क्यों तुम इंसानों ने उन्हें मार दिया? क्या वे बच्चे नहीं थे? क्या मैं मां नहीं हूं? क्या इसलिए कि मैं एक जानवर हूं तो मेरे बच्चे बच्चे नहीं है और मैं एक मां नहीं हूँ ?तुम लोगों को यह अधिकार किसने दिया मेरे बच्चों को मारने का? क्यों किया ऐसा ?क्यों क्यों क्यों?
शायद उसके उस चेहरे का सामना करने की मुझ में हिम्मत नहीं थी ।हम वापस घर आ गए। उस घटना के बाद में उसी को मैंने कभी अंजनिया में नहीं देखा । बस हाँ अंतिम बार जब मैं 12th class मे थी तब उसे देखा था ।और उस समय लूसी के शरीर पर जलने का निशान था जो शायद किसी ने गर्म पानी डाला था इसीलिए वैसा निशान था।
सचमुच हम इंसान जानवरों से भी नीचे गिर गए।सचमुच जानवर हमसे कहीं गुना बेहतर है क्योंकि वह इंसानों के बच्चों को इस कदर मारते नहीं। लूसी ने अपना परिवार हम इंसानों की लापरवाही से खो दिया था। मेरे भाई भारत को बचपन में लूसी ने जानवर होकर भी ममता दी और हम इंसान होकर भी उसकी ममता को समझ नहीं पाए। बात सिर्फ एक लूसी के परिवार की नहीं है। ऐसी कई लूसी के परिवारों को रोजाना लोगों के द्वारा तोड़ा जाता है।क्या हम सच में इतना गिर गए?
क्या सिर्फ इतना कहना काफी है-
We are sorry
Comments
Post a Comment